सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन – ब्रह्म समाज, आर्य समाज और राम कृष्ण मिशन

सामाजिक धार्मिक सुधार आंदोलन ने भारतीय समाज को अद्भुत परिवर्तनों में मदद की हैं, जिनमें ब्रह्म समाज, आर्य समाज और रामकृष्ण मिशन अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य समाज में उत्कृष्टता, समानता और न्याय की स्थापना करना था।

ब्रह्म समाज, राजा राममोहन राय के नेतृत्व में, वेदों के प्रति समर्पित था और उन्होंने सती प्रथा, बाल विवाह, और जातिवाद के खिलाफ उत्कृष्ट अभियान चलाया। आर्य समाज, स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित, वेदों को मान्यता देने वाला संगठन था और उन्होंने विधवा पुनरविवाह, साक्षरता, और वर्णव्यवस्था के खिलाफ अभियान चलाया। रामकृष्ण मिशन, स्वामी विवेकानंद के द्वारा स्थापित, मानवता की सेवा में लगा हुआ संगठन था और वह सभी धर्मों के समानता की प्रेरणा देता था।

1. ब्रह्म समाज (1828):-

  • इसके संस्थापक राजाराम मोहन राय थे। इन्हें राजा की उपाधि अकबर द्वितीय ने दिया था।
  • ये हिन्दू धर्म के कुप्रथाओं के विरूद्ध आवाज उठायें जिस कारण उन्हें भारतीय पुर्नजागरण (सुधार) तथा आधुनिक भारत का अगदूत कहा जाता है।
  • सुभाष चंद्र बोस ने इन्हें युग दूत कहा है।
  • इन्होंने 1817 में हिन्दू कॉलेज की स्थापना किया।
  • 1829 ई. में विलियम बैटिक के सहयोग से इन्होंने सती प्रथा का अंत कर दिया।
  • डेविड हेयर इनके प्रमुख सहयोगी थे। इन्हें फारसी बंगाली, अंग्रेजी तथा उर्दू का अच्छा ज्ञान था।
  • इन्होंने सर्वाधिक पत्रिका फारसी भाषा में लिखा । मिरातुल अखबार फारसी में तथा संवाद कौमुदी बंगाली में छपने वाले इनकी प्रमुख पत्रिकाएं थी।
  • 1833 ई. में लंदन में मेनिनजाइटिस के कारण इनकी मृत्यु हो गई। इनके दो प्रमुख शिष्य देवेन्द्र नाथ टैगोर तथा केशवचन्द्र सेन थे।
  • इनके मृत्यु के बाद ब्रह्मसमाज की बागडोर देवेनन्द्र नाथ टैगोर के हाथ में आ गई।
  • देवेन्द्र नाथ टैगोर तथा केश्व चन्द्र के बीच मतभेद हो गया। जिस कारण इन दोनों ने ही ब्रह्म समाज को छोड़ दिया देवेन्द्र नाथ टैगोर ने 1865 ई. में भारतीय आदी ब्रह्म समाज की स्थापना की।
  • जबकि 1867 में केश्वचन्द्र सेन ने वेद समाज की स्थापना कर दी।

2. आर्य समाज :-

  • इसके संस्थापक दयानंद सरस्वती थे।
  • इन्होंने आर्य समाज 1875 ई. में मुम्बई में किया और 1877 ई. में इसकी शाखा लाहौर में खोली।
  • आर्यसमाज का नारा था- ‘भारत भारतीयों के लिए है।”
  • जबकि दयानंद सरस्वती का नारा था- “वेदों की और लौटो।”
  • दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात में 1834 ई. में हुआ था।
  • इनका नाम मूल शंकर था। इनके गुरु विरजानंद थे। दयानंद ने सती प्रथा, बाल विवाह, पर्दा प्रथा का विरोध किया किन्तु महिला शिक्षा तथा विधवा पुर्नविवाह का समर्थन किया।
  • इनके मृत्यु के बाद 1886 में इनके शिष्य हंस राज ने DAV (दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज) की स्थापना किया जो भारत के लगभग सभी जिलों में फैल चुका है।

3. राम कृष्ण मिशन :-

  • इसके संस्थापक स्वामी विवेकानंद थे।
  • इन्होंने अपने गुरु रामकृष्ण के नाम पर इसका नामकरण किया।
  • विवेकानंद का जन्म 12 Jan, 1863 को हुआ। इनका नाम नरेन्द्र दत्त था।
  • रामकृष्ण परमहंस ने इन्हें हिन्दू धर्म की शिक्षा दी थी। 1887 ई. में इन्होंने कलकत्ता में बेलुरमढ़ की स्थापना की।
  • 1893 ई. में इन्होंने ऐतिहासिक शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लिया।
  • इन्होंने अमेरिका के न्यूयार्क में वेदान्त सोसायटी की स्थापना 1896 में कर दिया।
  • 1897 में इन्होंने बेलुरमठ को रामकृष्ण मिशन का अंतर्राष्ट्रीय मुख्यालय बना दिया।
  • 1902 में इनकी मृत्यु हो गई। इन्हें हिन्दू नेपोलियन या तुफानी हिन्दू कहते हैं। सुभाषचन्द्र बोस ने इन्हें भारत का अध्यात्मिक गुरु कहा।

4. थियोसोफिकल सोसायटी (1875) :-

  • इसकी स्थापना मैडम ब्लावाटस्की तथा कर्नल आलकाट ने कनाडा में किया।
  • यह संस्था विभिन्न देशों में संस्कृति तथा शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कार्यरत थी।
  • 1886 में इसकी एक शाखा मद्रास के अडियार में खोली गई जो आगे चलकर इस संस्था का मुख्यालय बन गया।
  • इसी शाखा की एक सदस्य बनकर आयरलैण्ड की महिला एनी बेसेंट भारत आयी।
  • इन्होंने आयरलैण्ड की भांति भारत में भी होमरूल आंदोलन प्रारंभ करना चाहती थी किन्तु भारत में यह सफल नहीं हो पाया।

5. यंग बंग आंदोलन :-

  • इसे हेनरी विलियम डेरिजीवो ने 1828 में प्रारंभ किया यह बंगाल के युवाओं का आंदोलन था।
  • ये भारतीय प्रेस की स्वतंत्रता की मांग करते थे।

6. धर्म सभा :-

  • धर्म सभा का गठन 1830 में राधाकांत देब द्वारा कलकत्ता में किया गया था ।
  • संगठन की स्थापना मुख्य रूप से राजा राम मोहन रॉय और हेनरी डेरोजियो जैसे नायकों के नेतृत्व में चल रहे सामाजिक सुधार आंदोलनों का मुकाबला करने के लिए की गई थी ।
  • अधिक विशेष रूप से, संगठन बनाने की प्रेरणा औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन द्वारा बनाए गए एक नए कानून से मिली, जिसने देश में विधवाओं को जिंदा जलाने ( सती ) की बर्बर प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया.
  • नए संघ का ध्यान उस कानून को निरस्त करने पर था जिसे हिंदू समुदाय के कुछ वर्गों द्वारा ब्रिटिशों द्वारा स्वदेशी लोगों के धार्मिक मामलों में घुसपैठ के रूप में देखा गया था।
  • धर्म सभा ने लॉर्ड विलियम बेंटिक द्वारा सती पर प्रतिबंध के खिलाफ प्रिवी काउंसिल में अपील दायर की , क्योंकि उनके अनुसार, यह हिंदू धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के जॉर्ज III द्वारा दिए गए आश्वासन के खिलाफ था.
  • हालाँकि, उनकी अपील खारिज कर दी गई और 1832 में सती पर प्रतिबंध बरकरार रखा गया।

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